रविवार, 16 जून 2019

मेरे पिता मेरे हीरो

कल रात देर से सोने के कारण सुबह नींद देर से खुली इसी कारण आज दुकान पहुचने में लेट हो गया। वेसे मेरे साथ ऐसा अक्सर ऐसा होता है में कभी दुकान पर समय से नही पहुँच पाता हु। दुकान पहुचने पर पता चला काम करने वाला एकमात्र कर्मचारी आज से दुकान पर नही आयेगा। पिताजी तब तक दुकान खोल चुके थे। दिया बत्ती करके कुछ देर मोबाइल लेकर बैठा तो सोशल मीडिया से पता चला कि आज फादर्स डे है। जब से सोशल मीडिया एक्टिव हुआ है तब से ये डे मनाने की प्रथा शुरू हुई है। हमारे बचपन और स्कूल के दिनों में तो ऐसी कोई प्रथा नही थी। फादर्स डे 365 दिन में एक दिन उनकी खातिरदारी करो , सोशल मीडिया पर उनके फोटो चिपकाओ बाकी दिन उनसे कोई सरोकार नही।

 मेरी पिताजी से हमेशा नोक झोंक होती रहती है। बहुत सारी जगह हमारे विचार मेल नही खाते कितनी ही मर्तबा किसी विषय को लेकर तीखी बहस भी होती है।  आज की घटना (कर्मचारी के जाने की) के बाद खाली बैठा था। फिर सोचा चलो आज फादर्स डे है और इतवार भी जो कि फुर्सत का दिन है क्यो ना पिताजी के बारे में कुछ लिखा जाए। पिताजी जीनकी उम्र लगभग 65 वर्ष है जिन्होंने बचपन से घोर अभाव देखे गरीबी का आवरण लिए इस दुनिया में दाखिल हुए और निरन्तर संघर्ष करते हुए आज हमें इस मुकाम पर पहुचाया। चाय की होटल पर काम हो, हलवाई का काम हो, या सिलावटी हर काम उम्र के अलग अलग दोर में किया और पैतृक काम सिलाई जो आज इस उम्र में भी बन्द नही की है। उनकी दिनचर्या सुबह 4.30 बजे से शुरू होकर रात 11 बजे तक चलती है इसमें दोपहर में कुछ समय का विश्राम भी सम्मिलित है। में ना तो कभी सुबह जल्द उठ पाता हूं ना उनकी तरह अपनी दिनचर्या बना पाता हु। लेकिन हर वक्त दिमाग मे उनकी तरह बनने का विचार जरूर रहता है। इंसान कितना ही बड़ा बन जाये लेकिन दुनिया मे पिता से बड़ा कभी नही हो सकता क्योंकि जो कष्ट उन्होंने हमें पालने में झेले है वो हमारे द्वारा उनके प्रति किये गए कर्तव्यों से कई गुना बड़े है जीवन के प्रति पिताजी उत्साह देखते ही बनता है। किसी रिश्तेदार से मेलमिलाप हो या किसी शादी या अन्य समारोह में शामिल होना हो उनका उत्साह हर कार्य के प्रति काबिले तारीफ होता है टेक्नोलॉजी के इस दौर में उनका टेक्निकल चीजो के प्रति प्रेम उनके जीवन की सकारात्मक सोच दर्शाता है वे एंड्रॉयड फोन का उपयोग करने वाले परिवार के सबसे ज्यादा उम्र के व्यक्ति है परिवार के दूसरे सदस्य जो उनसे उम्र में काफी छोटे है फोन का उपयोग ही नही जानते  वहीँ पिताजी वाट्सएप के जरिये अपने मित्रों और रिश्तेदरो से निरन्तर सम्पर्क में रहते है वही यूट्यूब पर हमेशा कुछ नया खोजा करते है
घर मे किसी अवसर पर समोसे बनाना हो या गुलाबजामुन पिताजी हमेशा उस काम में भी अपनी गहरी रुचि दिखाते है और अपने अनुभव से किसी पकवान के स्वाद को बढ़ाने में कोई कसर नही छोड़ते उनके हाथ की मवाबाटी आज भी किसी बड़े होटल या शेफ को मात देती है।

 ईश्वर के प्रति इतनी गहरी आस्था है की हर काम ईश्वर के नाम से ही शुरू करते है कितना ही काम हो या कितनी ही जल्दी सुबह कँही जाना हो बिना पूजा पाठ और मंदिर दर्शन के बगैर कभी घर से नही निकलते उनकी जीवन के प्रति यही सकारात्म सोच हमे प्रेरित करती है निरन्तर संघर्ष करने के लिए कितनी ही बार विपरीत परिस्थितिया आई लेकिन पिताजी हमेशा प्रेरणास्त्रोत बने रहे बहुत से मौकों पर मतभिन्नता रही लेकिन जीवन के असली हीरो हमेशा पिताजी ही रहें हैं।

आज फादर्स डे पर उनको बहुत बधाई और ईश्वर से प्रार्थना वे सदैव हस्ते मुस्कुराते रहे स्वस्थ रहे और उनका जीवन के प्रति यही सकारात्म नजरिया हमारा प्रेरणा स्त्रोत बना रहे

भवानीप्रसाद मिश्र जी की एक कविता की कुछ पंक्तियाँ जो उनके जीवन से मेल खाती है

पिताजी जिनको बुढ़ापा,
एक क्षण भी नहीं व्यापा,
जो अभी भी दौड़ जाएं,
जो अभी भी खिल-खिलाएं,


मौत के आगे न हिचकें,
शेर के आगे न बिचकें,
बोल में बादल गरजता,
कम में झंझा लरजता,


आज गीता पाठ करके,
दंड दो सौ आठ करके,
ख़ूब मुगदर हिला लेकर,
मूठ उसकी मिला लेकर,



देह एक पहाड़ जैसे,
मन कि बड़ का झाड़ जैसे


एक पत्ता टूट जाये,
बस कि धारा फूट जाये,
एक हलकी चोट लग ले,
दूध की नद्दी उमग ले,


एक टहनी कम न होले,
कम कहां कि ख़म न होले,
ध्यान कितना फ़िक्र कितनी,
डाल जितनी जड़ें उतनी !

इस तरह का हाल उनका,
इस तरह का ख़याल उनका,




Happy fathers day
            पापा

शनिवार, 8 सितंबर 2018

मांडव (सिटी ऑफ जॉय) एकदिवसीय यात्रा


1 जनवरी 2011 को कोहरे में लिपटी हुई सुहानी सुबह हम सपरिवार मांडव(मांडू) की एकदिवसीय यात्रा पर नये वर्ष का आगाज करने निकले!
मांडव जो विनध्याचल पर्वत श्रंखलाओ में समुद्रतल से  2000 फुट की ऊँचाई पर है जो की 11 वी शताब्दी में परमार राजाओ की राजधानी रहा है
कैसे पहुचे:- मध्यप्रदेश के धार जिले में धार से 30 किलोमीटर तथा
इंदौर से 100 किलोमीटर सड़क मार्ग से जुड़ा है  महू, इंदौर, खण्डवा निकटम रेलवे स्टेशन है इंदौर निकटम हवाई अड्डा है
कब जाए:- जुलाई से मार्च तक का समय सबसे उत्तम है
क्या देखे:- नीलकण्ठ,जहाज महल, हिन्डोला महल, शाही हमाम, जामा मस्जिद, होशंगशाह का मकबरा, रानी रूपमती का महल, बाजबहादुर का महल
मालवा का कश्मीर कहे जाने वाले मांडू (माण्डव) को बसाने का श्रेय परमार राजाओ को जाता है मांडू को खुशियो की नगरी (सिटी ऑफ जॉय) भी कहा जाता है मांडू में मुखयतः चार राजवंशो का कार्यकाल रहा परमार, मुंगलो, सुल्तान एव पंवार वंश,  मांडू अपने आप मे बहुत बड़ा इतिहास छिपाये बेठा है
मालवा की माटी गहन गम्भीर
पग  पग रोटी  डग डग नीर,
की कहावत को चरितार्थ करती मांडू नगरी को निहारने हजारो की संख्या में पर्यटक रोजाना यहां आते है हम लोग 1 जनवरी की सुबह 6 बजे अपने गृहनगर सोनकच्छ जो इंदौर भोपाल राजमार्ग पर देवास से 32 किलोमीटर एव इंदौर से 65 किलोमीटर है से मांडव की और प्रस्थान किया इंदौर से घाटाबिल्लोड, लेबड़ होते हुए धार की और रुख किया धार से कुछ पहले ही मांडू  के लिए रास्ता अलग हो जाता है  इंदौर से धार का रास्ता काफी खराब था जिस वजह से हम लोग लगभग 12.30 बजे मांडू पहुचे!
जामी मस्जि्द


मांडू में सबसे पहले हमने जामी मस्जिद देखी यहां करीब 1 घन्टा रुके इसकी गणना भारत की बड़ी मस्जिदों में की जाती है इसके पीछे ही होशंगशाह का मकबरा है कहते शाहजहाँ ने इसी की तर्ज पर ताज़महल का निर्माण कराया था जामी मस्जिद और होशंगशाह का मकबरा इत्मिनान से देखने और बहुत सारे फोटो निकालने के पश्चात यहां से रानी रूपमती के महल और बाजबहादुर के महल की ओर प्रस्थान किया
बाजबहादुर का महल

 मालवा के अंतिम सुल्तान मियांन बायजीद बाजबहादुर खान जो कि बाजबहादुर के नाम से प्रसिद्ध था  रानी रूपमती और बाजबहादुर की अमर प्रेम कहानी मांडू की फिजाओ में आज भी गूंजती है कहते है रानी नर्मदा दर्शन करने के बाद ही भोजन ग्रहण करती थी रानी की इसी इच्छा को पूरा करने के लिए बाजबहादुर ने रूपमती महल का निर्माण कराया था जहाँ से रानी रोज नर्मदा दर्शन करती थी
बाजबहादुर के महल को देखने के बाद रानी रूपमती के महल के लिए प्रस्थान किया रानी का महल अत्यधिक उचाई पर होने से वहां से अदभुद नजारे दिखाई देते है यहां पर बहुत सारे फोटो निकाले गए रानी का महल देखने के बाद सभी लोगो को जोरो की भूख लगी थी इस हेतु नीलकण्ठ महादेव पर भोजन जो घर से बना कर लाये थे करने का निश्चय हुआ एव नीलकण्ठ महादेव की और रुख किया गया नीलकण्ठ दर्शन के पश्चात वही पर  घर से लाई गई भोजन सामग्री ग्रहण की गई
रानी का महल

एव अगले पड़ाव जहाज महल की और चल दिये हमारा अगला एव अंतिम पड़ाव मांडव का मुख्य आकर्षण जहाज महल था जहां पहुचने पर एक अलग ही आनन्द का अनुभव होता है जहाज महल दो तालाबो के बीच स्थित होने से तालाब के जल में महल जहाज की भांति दिखाई देता है हालांकि तालाब में पानी कम तथा काई युक्त होने से हमे ऐसा कुछ दिखाई नही दिया सबसे ज्यादा  चहल पहल इसी जगह थी यह फोटो निकालने की सर्वोत्तम जगह है यहां आसपास खाने पीने की कई दुकानें एव अन्य सामान की दुकाने भी उपलब्ध थी इसके प्रवेश द्वार के पास ही एक संग्रहालय भी बना है जहाँ मांडू के इतिहास से सम्बंधित कुछ चीजें एव जानकारी उपलब्ध है   महल की छत पर से चारो ओर अत्यंत मनमिहक नजारा दिखाई देता है

जहाज महल के पास ही हिंडोला महल स्थित हैं हिंडोला महल का शाब्दिक अर्थ है झूलती जगह जिसका उपयोग दरबार के रूप में किया जाता था जहाँ राजा बैठकर प्रजा की समस्या सुनते थे इस महल की बाहरी दीवारे 77 डिग्री  पर झुकी हुई है इसलिए भी इसे हिंडोला महल कहते है पास ही स्थित शाही हमाम एव चम्पा बावड़ी भी देखी अपनी इस एकदिवसीय यात्रा का सर्वाधिक समय जहाज महल और इसके आसपास के स्थान देखने मे ही बीता अब घड़ी में समय शाम के साढे पांच का हो चुका था जहाज महल से बाहर आकर  स्वल्पाहार किया एवं घर की और प्रस्थान किया रास्ते मे एक अच्छे से हॉटल पर रात्रि भोज किया एव लगभग 10 बजे घर पहुंचे और इस यादगार यात्रा को पूर्णविराम दिया!














मंगलवार, 5 जून 2018

आज विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जा रहा है मनुष्य द्वारा प्रकृति के असीमित दोहन के फलस्वरूप उपजे असंतुलन को देखते हुए विश्व पर्यावरण दिवस मनाने की जरूरत पड़ी विश्व पर्यावरण दिवस सम्पूर्ण विश्व को पर्यावरण के प्रति जाग्रत करने का संदेश प्रेषित करता है
आज हम देखे तो हमारे आसपास की प्रकृति बदल चुकी है जहाँ जंगल नदी पहाड़ होते थे वहां आज मानव बस्ती, गन्दे  नाले और कुड़े के ढेर है पर्यावरण को सर्वाधिक नुकसान पेड़ो के कटाई प्लास्टिक के उपयोग वाहनों के धुएं और कारखाने से निकलने वाले धुएं और केमिकल युक्त पानी से हुआ है और इसके दुष्प्रभाव से प्रकर्ति अपना संतुलन खो रही है ऋतुए अपना समय बदल रही है ना समय पर बारिश आती है ना ठंड कुछ जगह बारिश अत्यधिक होती है तो कुछ जगह अल्प बारिश ग्लोबल वार्मिग के चलते पृथ्वी का तापमान लगातार बढ़ रहा है

 इस वर्ष पर्यावरण दिवस 2018 को 'बीट प्लास्टिक पलूशन' थीम पर मनाने का फैसला किया गया। इसके जरिए सरकारों, उद्योगों, विभिन्न समुदायों और आम जनता से मिलकर प्लास्टिक से निपटने का अनुरोध किया जा रहा है जिससे विकल्प तलाश कर प्लास्टिक उत्पादन में कमी लाई जा सके। भारत इस बार विश्व पर्यावरण दिवस का ग्लोबल होस्ट भी है!
हमे अगर हमारा पर्यावरण हमारी पृथ्वी बचानी है तो धरती को सबसे ज्यादा प्रदूषित करने वाली वस्तु प्लास्टिक का विकल्प खोजना होगा हम अगर अपनी छोटी छोटी जरूरतों में प्लास्टिक का उपयोग बन्द कर दे तो बहुत हद तक इस समस्या से निपटा जा सकता है
विवाह समारोह व अन्य आयोजन में जो प्लास्टिक ग्लास पानी की बोतले उपयोग की जा रही है उनकी जगह धातु या कांच के दोबारा उपयोग में लिये जाने वाले ग्लास प्रयोग करे बाजार में खरीदारी करते समय अपने साथ कपड़े का बैग इस्तेमाल करे जहा तक सम्भव हो प्लास्टिक के उपयोग को नकारे जब तक आमलोग प्लास्टिक का बहिष्कार नही करते इस समस्या का समाधान सम्भव नही दिखता साथ ही पृथ्वी को हरा भरा बनाए रखने के लिए वृक्ष लगाना भी उतना ही जरूरी है
 बीते कुछ वर्षो में प्रकृतिक दुर्घटनाओं का बढ़ना भी इसी असंतुलन के परिणामस्वरूप हो रहा है केदारनाथ में हुई घटना कहि ना कहि प्रकृति से छेड़छाड़ का नतीजा है इस तरह की घटनाएं हमे इंगित करती है कि अब भी समय है हम प्रकृति की विनाशलीला से बच सकते है हमे प्रकर्ति के साथ हो रहे खिलवाड़ विरूद्ध जनजागृति लानी होगी तभी पर्यावरण दिवस मनाना सार्थक होगा
पर्यावरण में बदलाव मनुष्य की सेहत को भी प्रभावित कर रहा है ऐसे कई शोध हुए है जिनमे केन्सर, जैसे रोगों के लिए प्लास्टिक फेफड़ो के संक्रमण के लिए वाहनों के जरिये वायु में घुल रहे लेड को जिम्मेदार माना गया है अब तो बच्चो में जन्म से कई विकृतियां होने लगी है जिसकी बड़ी वजह भी पर्यावरण का बिगड़ना है प्लास्टिक को खत्म होने में 700 से 1000 वर्ष लगते है इतने वर्षों में ये हमारी पृथ्वी को कितना नुकसान पहुचायेगी इसकी कल्पना कीजिये, आज से ही प्लास्टिक से बने उत्पादों का उपयोग सीमित कीजिये तभी पर्यावरण दिवस मनाने का महत्व सार्थक होगा!

सोमवार, 14 मई 2018

अपनी बगिया में फिर गुलाब नही खिला

चंपा  चमेली   बेला  जूही  सबकुछ खिला
लेकिन कभी इस बगिया में गुलाब नही खिला

यू तो आते जाते रहे हर मौसम बदलकर
बस फिर कभी हमे वो सावन नही मिला

देखे है सभी रँग इंद्रधनुषी उस आसमान में
लेकिन हमे फिर कभी वो गुलाल नही मिला

जीवन के उपवन मे गुलमोहर मिला अमलताश मिला
लेकिन फिर कभी वो दहकता सुर्ख पलाश नही मिला

जिंदगी की बगिया महकी तो बहुत
लेकिन फिर कभी वो गुलाब नही खिला

सोमवार, 23 अप्रैल 2018

देवास जहाँ है दो देवियो का वास

देवास जहां है दो देवियों का वास

देवास जहाँ हो दो देवियो का वास, जी हाँ हम बात कर रहे है मध्यप्रदेश के देवास की जो जिला मुख्यालय होने के साथ ही पंवार राजवंश की राजधानी रहा है साथ ही माता टेकरी के कारण पूरे देश मे प्रसिद्ध है
देवास शहर प्रदेश की आर्थिक राजधानी इंदौर से 35 किलोमीटर आगरा मुंबई मार्ग पर स्थित है एव प्रदेश की धार्मिक नगरी उज्जैन से 40 किलोमीटर भोपाल की और स्थित है देवास रेलमार्ग से भी जुड़ा हुआ है
माँ तुलजा भवानी,  देवास माता टेकरी के लिए प्रसिद्ध है जहाँ माँ तुलजा भवानी का मंदिर है जिन्हें लोग बड़ी माता के नाम से भी जानते है
चामुंडा देवी:-
चामुंडा देवी देवास रियासत के राजपरिवार पँवार वंश की कुलदेवी है जिन्हें छोटी माता के नाम से जाना जाता है

धार्मिक महत्व:
यहाँ के पुजारी बताते हैं कि बड़ी माँ और छोटी माँ के मध्य बहन का रिश्ता था। एक बार दोनों में किसी बात पर विवाद हो गया। विवाद से क्षुब्द दोनों ही माताएँ अपना स्थान छोड़कर जाने लगीं। बड़ी माँ पाताल में समाने लगीं और छोटी माँ अपने स्थान से उठ खड़ी हो गईं और टेकरी छोड़कर जाने लगीं।

माताओं को कुपित देख माताओं के साथी (माना जाता है कि बजरंगबली माता का ध्वज लेकर आगे और भेरूबाबा माँ का कवच बन दोनों माताओं के पीछे चलते हैं) हनुमानजी और भेरूबाबा ने उनसे क्रोध शांत कर रुकने की विनती की। इस समय तक बड़ी माँ का आधा धड़ पाताल में समा चुका था। वे वैसी ही स्थिति में टेकरी में रुक गईं। वहीं छोटी माता टेकरी से नीचे उतर रही थीं। वे मार्ग अवरुद्ध होने से और भी कुपित हो गईं और जिस अवस्था में नीचे उतर रही थीं, उसी अवस्था में टेकरी पर रुक गईं।

इस तरह आज भी माताएँ अपने इन्हीं स्वरूपों में विराजमान हैं। यहाँ के लोगों का मानना है कि माताओं की ये मूर्तियाँ स्वयंभू हैं और जागृत स्वरूप में हैं। सच्चे मन से यहाँ जो भी मन्नत माँगी जाती है, हमेशा पूरी होती है। इसके साथ ही देवास के संबंध में एक और लोक मान्यता यह है कि यह पहला ऐसा शहर है, जहाँ दो वंश राज करते थे- पहला होलकर राजवंश और दूसरा पँवार राजवंश। बड़ी माँ तुलजा भवानी देवी होलकर वंश की कुलदेवी हैं और छोटी माँ चामुण्डा देवी पँवार वंश की कुलदेवी।

टेकरी में दर्शन करने वाले श्रद्धालु बड़ी और छोटी माँ के साथ-साथ भेरूबाबा के दर्शन अनिवार्य मानते हैं। नवरात्र के दिन यहाँ दिन-रात लोगों का ताँता लगा रहता है। इन दिनों यहाँ माता की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है।

मा धूमावती एव जैन तीर्थ पुष्पगिरी की नगरी सोनकच्छ

देवास जिले की सोनकच्छ तहसील वेसे तो देवास भोपाल स्टेट हाइवे पर स्थित है लेकीन इस नगर की अपनी एक अलग पहचान है इस पवित्र भूमि को सन्तो ने अपनी कर्मभूमि बनाया।
बाबा महेश्वरानन्द जी, पुष्पदंत सागरजी, तरुण सागरजी, प्रकाशनन्द जी, नित्यंमुक्तनन्द जी, जैसे सन्त इस नगर को  सुशोभित कर चुके है
सबसे पहले बात नगर के प्राचीन पिपलेश्वर महादेव की कालीसिंध नदी के तट पर स्थित पिपलेश्वर महादेव का मंदिर अति प्राचीन मंदिर है यहां बाबा महेश्वरनन्द जी ने कई वर्षों तक तप किया एव धर्म संस्कृति की रक्षा हेतु कार्य किया बाबा महेश्वरानन्द जी सिद्ध सन्त थे वे हर वर्ष महाशिवरात्रि पर मेले एव भंडारे का आयोजन कालीसिंध के तट पर करवाते थे
एक वर्ष भंडारे में हलवे का प्रसाद कम पड़ गया तुरन्त हलुआ बनाने के लिए देशी घी की आवश्यकता पड़ी लेकिन इतनी जल्दी इतना घी उपलब्ध न हो सका तब बाबा ने कालीसिंध में से चार पीपेे भरवाए लेकिन पीपे में पानी की जगह घी था भंडारा पुर्ण होने के बाद जब बाहर से घी उपलब्ध हुआ बाबा ने उसे कालीसिंध में डलवा दिया बताया जाता है बाबा ने भंडारे का संकल्प पूर्ण करने के लिए कालीसिंध मैया से घी उधर मांगा था और उसे वापस लौटाया भी इसी प्रकार नगर को एक और सिद्ध जैन सन्त पुष्पदन्त  जी महाराज का भी सानिध्य मिला जिनके नाम पर प्रसिद्व जैन तीर्थ पुष्पगिरी की नींव रखी गई जहां आज मन्दिर, स्कूल, कॉलेज, अस्पताल आदि संचालित किए जाते है
आचार्य श्री के बारे में भी कहा जाता है वो एक बार यहां से गुजर रहे थे तब पुष्पगिरी बंजर पहाड़ी थी पहाड़ी के पास से निकलते हुए उन्हें कांटा चुभ गया तब उन्होंने संकल्प लिया था इस जगह को एक दिन फूलों से भर देंगे और आज परिणामस्वरूप पुष्पगिरी तीर्थ हमारे सामने है

माता धूमावती का भारत का दूसरा मन्दिर :
कालीसिन्ध नदी के पावन तट पर प्राचीन कोटेश्वर मन्दिर में स्वामी नित्यंमुक्तनन्द जी महाराज की प्रेरणा से धूमावती शक्तिपीठ की स्थापना कुछ वर्ष पूर्व की गई दतिया के बाद ये भारत का दूसरा धुमावती शक्ति पीठ है यहां सम्पुर्ण भारत से माता धूमावती के भक्त दर्शन को आते है मन्दिर परिसर अत्यंत सुंदर व आकर्षक है एव नदी के किनारे पर है जिससे इसकी सुंदरता और बढ़ जाती है
अगर आप सोनकच्छ से गुजर रहै है तो प्रसिद्ध पप्पू जी के ढ़ाबे का का खाना जरूर खाइये

विक्रमादित्य के पिता गन्धर्वसेन की नगरी गन्धर्वपूरी :

सोनकच्छ नगर से 10 किलोमीटर ग्राम गंधर्वपुरी है जो अति प्राचीन नगर है यहां अत्यंत प्राचीन गन्धर्वसेन का मंदिर है गन्धर्वसेन महाराज विक्रमादित्य के पिता थे इसे श्रापित नगर भी कहा जाता है कहते है यहां एक बार धुलकोट पड़ा था तब ये नगर पूरा पत्थर का हो गया जिसके प्रमाण यहां यंत्र तंत्र पड़े पत्थर की आकृतियां है
गन्धर्वसेन मन्दिर के ऊपरी भाग में चुहापाली बनी हुई है कहते है यहां रात में चूहे सांप की परिक्रमा करते है जिसका प्रमाण यहां रोजाना सुबह जब चुहापाली को खोला जाता है तो मध्य में सांप की लेंडी और आस पास परिक्रमा मार्ग में चूहे की लेंडी मिलती है और ये घटना यहां प्राचीन समय से होती रही है चुहापाली की रोजाना सफाई होती है फिर भी हर सुबह यह चमत्कार देखने को मिलता है मन्दिर के आसपास प्राचीन मूर्तिया बिखडी पड़ी है जो लोगो के मन मे इस नगर के रहस्य को जानने की उत्सुकता पैदा करती है

बाबा भवर नाथ की नगरी भौरासा :

मालवांचल के गांव भौंरासा में स्थित है भंवरनाथ जी का मंदिर। कहते हैं कि इस स्थान पर भंवरालाल महाराज ने समाधि है। भंवरलाल को भंवरसिंह भी कहा जाता था, क्योंकि वह राजपूत समाज से थे। यहां पर राजा मानसिंह ने भंवरनाथ की चांदी की प्रतिमा भी भेंट की थी। यह प्रतिमा आज भी मंदिर में स्थित है। इसके अलावा यहां मनकामनेश्वर भगवान की मूर्ति भी है।

ऐसी भी मान्यता है कि उज्जैन के राजा नल और उनकी पत्नी दमयंति ने अपना अज्ञातवास इसी क्षेत्र में बिताया था। यह क्षेत्र कई संतों की तपस्थली भी रहा है।

भंवरनाथ मंदिर के कारण ही उक्त गांव का नाम भंवरासा (भौंरासा) पड़ा। इस मंदिर से ‍जुड़ी अनेक चमत्कारिक घटनाएं है। यहां के गांव में एक घटना यह भी प्रसिद्ध है कि औरंगजेब ने इस मंदिर पर आक्रमण किया और कुल्हाड़ी से शिवलिंग पर वार किया, तब अचानक शिवलिंग से रक्त की धारा फूट पड़ी। यह देख औरंगजेब घबरा गया फिर वह यह स्थान छोड़कर चला गया।

औरंगजेब ‍द्वारा शिवलिंग पर किया गया वार का निशान आज भी वहां मौजूद है। यह ग्राम भी बौद्धकालीन ग्राम माना जाता है, इसीलिए आज भी यहां जगह-जगह पुरातन अवशेष मौजूद है।
इस कड़ी में बस इतना ही अगली कड़ी में देवास जिले की अन्य जगहों से परिचय कराया जाएगा

सोमवार, 19 मार्च 2018

ओ री चिरैया



20 मार्च विश्व गोरैया दिवस है हमारे घर आंगन में फुदकने वाला ये पक्षी अब कम ही दिखता है कीटनाशकों के बढ़ते प्रयोग, मोबाइल टावरों से निकलने वाली विकिरण, कंक्रीट के मकान, बढ़ता प्रदूषण, गोरैया की सँख्या में कमी का प्रमुख कारण है
इस पक्षी को बचाने के लिए हम सब मिलकर कोशिश करे 
हम अपने घरों के आस पास इसके लिए दाना पानी की व्यवस्था करे, छतों खिड़कियी में लकड़ी के छोटे बॉक्स या मिट्टी की छोटी सुराही रखे जिसमे ये पक्षी अपना घोंसला बना सके!
गोरैया के संरक्षण में हम सब अपना योगदान प्रदान करे, नही तो एक दिन हम अपने बच्चो को सिर्फ कविताओं में ही "चु चु करती आई चिड़िया", "एक चिड़िया अनेक चिड़िया" पढ़ाएंगे 
आने वाली पीढ़ी इस पक्षी के दर्शन से वंचित रह जायेगी