सोमवार, 23 अप्रैल 2018

देवास जहाँ है दो देवियो का वास

देवास जहां है दो देवियों का वास

देवास जहाँ हो दो देवियो का वास, जी हाँ हम बात कर रहे है मध्यप्रदेश के देवास की जो जिला मुख्यालय होने के साथ ही पंवार राजवंश की राजधानी रहा है साथ ही माता टेकरी के कारण पूरे देश मे प्रसिद्ध है
देवास शहर प्रदेश की आर्थिक राजधानी इंदौर से 35 किलोमीटर आगरा मुंबई मार्ग पर स्थित है एव प्रदेश की धार्मिक नगरी उज्जैन से 40 किलोमीटर भोपाल की और स्थित है देवास रेलमार्ग से भी जुड़ा हुआ है
माँ तुलजा भवानी,  देवास माता टेकरी के लिए प्रसिद्ध है जहाँ माँ तुलजा भवानी का मंदिर है जिन्हें लोग बड़ी माता के नाम से भी जानते है
चामुंडा देवी:-
चामुंडा देवी देवास रियासत के राजपरिवार पँवार वंश की कुलदेवी है जिन्हें छोटी माता के नाम से जाना जाता है

धार्मिक महत्व:
यहाँ के पुजारी बताते हैं कि बड़ी माँ और छोटी माँ के मध्य बहन का रिश्ता था। एक बार दोनों में किसी बात पर विवाद हो गया। विवाद से क्षुब्द दोनों ही माताएँ अपना स्थान छोड़कर जाने लगीं। बड़ी माँ पाताल में समाने लगीं और छोटी माँ अपने स्थान से उठ खड़ी हो गईं और टेकरी छोड़कर जाने लगीं।

माताओं को कुपित देख माताओं के साथी (माना जाता है कि बजरंगबली माता का ध्वज लेकर आगे और भेरूबाबा माँ का कवच बन दोनों माताओं के पीछे चलते हैं) हनुमानजी और भेरूबाबा ने उनसे क्रोध शांत कर रुकने की विनती की। इस समय तक बड़ी माँ का आधा धड़ पाताल में समा चुका था। वे वैसी ही स्थिति में टेकरी में रुक गईं। वहीं छोटी माता टेकरी से नीचे उतर रही थीं। वे मार्ग अवरुद्ध होने से और भी कुपित हो गईं और जिस अवस्था में नीचे उतर रही थीं, उसी अवस्था में टेकरी पर रुक गईं।

इस तरह आज भी माताएँ अपने इन्हीं स्वरूपों में विराजमान हैं। यहाँ के लोगों का मानना है कि माताओं की ये मूर्तियाँ स्वयंभू हैं और जागृत स्वरूप में हैं। सच्चे मन से यहाँ जो भी मन्नत माँगी जाती है, हमेशा पूरी होती है। इसके साथ ही देवास के संबंध में एक और लोक मान्यता यह है कि यह पहला ऐसा शहर है, जहाँ दो वंश राज करते थे- पहला होलकर राजवंश और दूसरा पँवार राजवंश। बड़ी माँ तुलजा भवानी देवी होलकर वंश की कुलदेवी हैं और छोटी माँ चामुण्डा देवी पँवार वंश की कुलदेवी।

टेकरी में दर्शन करने वाले श्रद्धालु बड़ी और छोटी माँ के साथ-साथ भेरूबाबा के दर्शन अनिवार्य मानते हैं। नवरात्र के दिन यहाँ दिन-रात लोगों का ताँता लगा रहता है। इन दिनों यहाँ माता की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है।

मा धूमावती एव जैन तीर्थ पुष्पगिरी की नगरी सोनकच्छ

देवास जिले की सोनकच्छ तहसील वेसे तो देवास भोपाल स्टेट हाइवे पर स्थित है लेकीन इस नगर की अपनी एक अलग पहचान है इस पवित्र भूमि को सन्तो ने अपनी कर्मभूमि बनाया।
बाबा महेश्वरानन्द जी, पुष्पदंत सागरजी, तरुण सागरजी, प्रकाशनन्द जी, नित्यंमुक्तनन्द जी, जैसे सन्त इस नगर को  सुशोभित कर चुके है
सबसे पहले बात नगर के प्राचीन पिपलेश्वर महादेव की कालीसिंध नदी के तट पर स्थित पिपलेश्वर महादेव का मंदिर अति प्राचीन मंदिर है यहां बाबा महेश्वरनन्द जी ने कई वर्षों तक तप किया एव धर्म संस्कृति की रक्षा हेतु कार्य किया बाबा महेश्वरानन्द जी सिद्ध सन्त थे वे हर वर्ष महाशिवरात्रि पर मेले एव भंडारे का आयोजन कालीसिंध के तट पर करवाते थे
एक वर्ष भंडारे में हलवे का प्रसाद कम पड़ गया तुरन्त हलुआ बनाने के लिए देशी घी की आवश्यकता पड़ी लेकिन इतनी जल्दी इतना घी उपलब्ध न हो सका तब बाबा ने कालीसिंध में से चार पीपेे भरवाए लेकिन पीपे में पानी की जगह घी था भंडारा पुर्ण होने के बाद जब बाहर से घी उपलब्ध हुआ बाबा ने उसे कालीसिंध में डलवा दिया बताया जाता है बाबा ने भंडारे का संकल्प पूर्ण करने के लिए कालीसिंध मैया से घी उधर मांगा था और उसे वापस लौटाया भी इसी प्रकार नगर को एक और सिद्ध जैन सन्त पुष्पदन्त  जी महाराज का भी सानिध्य मिला जिनके नाम पर प्रसिद्व जैन तीर्थ पुष्पगिरी की नींव रखी गई जहां आज मन्दिर, स्कूल, कॉलेज, अस्पताल आदि संचालित किए जाते है
आचार्य श्री के बारे में भी कहा जाता है वो एक बार यहां से गुजर रहे थे तब पुष्पगिरी बंजर पहाड़ी थी पहाड़ी के पास से निकलते हुए उन्हें कांटा चुभ गया तब उन्होंने संकल्प लिया था इस जगह को एक दिन फूलों से भर देंगे और आज परिणामस्वरूप पुष्पगिरी तीर्थ हमारे सामने है

माता धूमावती का भारत का दूसरा मन्दिर :
कालीसिन्ध नदी के पावन तट पर प्राचीन कोटेश्वर मन्दिर में स्वामी नित्यंमुक्तनन्द जी महाराज की प्रेरणा से धूमावती शक्तिपीठ की स्थापना कुछ वर्ष पूर्व की गई दतिया के बाद ये भारत का दूसरा धुमावती शक्ति पीठ है यहां सम्पुर्ण भारत से माता धूमावती के भक्त दर्शन को आते है मन्दिर परिसर अत्यंत सुंदर व आकर्षक है एव नदी के किनारे पर है जिससे इसकी सुंदरता और बढ़ जाती है
अगर आप सोनकच्छ से गुजर रहै है तो प्रसिद्ध पप्पू जी के ढ़ाबे का का खाना जरूर खाइये

विक्रमादित्य के पिता गन्धर्वसेन की नगरी गन्धर्वपूरी :

सोनकच्छ नगर से 10 किलोमीटर ग्राम गंधर्वपुरी है जो अति प्राचीन नगर है यहां अत्यंत प्राचीन गन्धर्वसेन का मंदिर है गन्धर्वसेन महाराज विक्रमादित्य के पिता थे इसे श्रापित नगर भी कहा जाता है कहते है यहां एक बार धुलकोट पड़ा था तब ये नगर पूरा पत्थर का हो गया जिसके प्रमाण यहां यंत्र तंत्र पड़े पत्थर की आकृतियां है
गन्धर्वसेन मन्दिर के ऊपरी भाग में चुहापाली बनी हुई है कहते है यहां रात में चूहे सांप की परिक्रमा करते है जिसका प्रमाण यहां रोजाना सुबह जब चुहापाली को खोला जाता है तो मध्य में सांप की लेंडी और आस पास परिक्रमा मार्ग में चूहे की लेंडी मिलती है और ये घटना यहां प्राचीन समय से होती रही है चुहापाली की रोजाना सफाई होती है फिर भी हर सुबह यह चमत्कार देखने को मिलता है मन्दिर के आसपास प्राचीन मूर्तिया बिखडी पड़ी है जो लोगो के मन मे इस नगर के रहस्य को जानने की उत्सुकता पैदा करती है

बाबा भवर नाथ की नगरी भौरासा :

मालवांचल के गांव भौंरासा में स्थित है भंवरनाथ जी का मंदिर। कहते हैं कि इस स्थान पर भंवरालाल महाराज ने समाधि है। भंवरलाल को भंवरसिंह भी कहा जाता था, क्योंकि वह राजपूत समाज से थे। यहां पर राजा मानसिंह ने भंवरनाथ की चांदी की प्रतिमा भी भेंट की थी। यह प्रतिमा आज भी मंदिर में स्थित है। इसके अलावा यहां मनकामनेश्वर भगवान की मूर्ति भी है।

ऐसी भी मान्यता है कि उज्जैन के राजा नल और उनकी पत्नी दमयंति ने अपना अज्ञातवास इसी क्षेत्र में बिताया था। यह क्षेत्र कई संतों की तपस्थली भी रहा है।

भंवरनाथ मंदिर के कारण ही उक्त गांव का नाम भंवरासा (भौंरासा) पड़ा। इस मंदिर से ‍जुड़ी अनेक चमत्कारिक घटनाएं है। यहां के गांव में एक घटना यह भी प्रसिद्ध है कि औरंगजेब ने इस मंदिर पर आक्रमण किया और कुल्हाड़ी से शिवलिंग पर वार किया, तब अचानक शिवलिंग से रक्त की धारा फूट पड़ी। यह देख औरंगजेब घबरा गया फिर वह यह स्थान छोड़कर चला गया।

औरंगजेब ‍द्वारा शिवलिंग पर किया गया वार का निशान आज भी वहां मौजूद है। यह ग्राम भी बौद्धकालीन ग्राम माना जाता है, इसीलिए आज भी यहां जगह-जगह पुरातन अवशेष मौजूद है।
इस कड़ी में बस इतना ही अगली कड़ी में देवास जिले की अन्य जगहों से परिचय कराया जाएगा

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