सोमवार, 14 मई 2018

अपनी बगिया में फिर गुलाब नही खिला

चंपा  चमेली   बेला  जूही  सबकुछ खिला
लेकिन कभी इस बगिया में गुलाब नही खिला

यू तो आते जाते रहे हर मौसम बदलकर
बस फिर कभी हमे वो सावन नही मिला

देखे है सभी रँग इंद्रधनुषी उस आसमान में
लेकिन हमे फिर कभी वो गुलाल नही मिला

जीवन के उपवन मे गुलमोहर मिला अमलताश मिला
लेकिन फिर कभी वो दहकता सुर्ख पलाश नही मिला

जिंदगी की बगिया महकी तो बहुत
लेकिन फिर कभी वो गुलाब नही खिला